चेहरों के बाजार में
चेहरों से
पूता चेहरा
रिमोट रूपया राम ,
लोक हाट के
हाथ है रंगत
भज लो उसका नाम !
मान चालीसा
तुलसी रचता
छुटभैये आँख दिखाते,
तानसेन है
मौन कौने में
ऐरे-गिरे गाते
थार की मझधार
दिखाते
समदर का विस्राम ...
कालगर्ल
अब रंग जमाती
`मांड` हुआ बेनूर,
पौधे तरसे
पानी को अब
गुलदस्ते भरपूर
मूल्यों के
दाता टकराते
अब राजनीति के जाम ...
शेर-बकरियां
एक घाट अब
पदासीन नाटक,
भक्सक ही
रक्सक बन बैठा
ढूंढो चेहरों का चातक
भरो पहेली
कैसे आये
चेहरों को आराम...!
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