रविवार, 13 दिसंबर 2009

आदमी






आदमी

वे तीन थे । एक हिन्दू, दूसरा मुसलमान और तीसरा सिख । अलग-अलग कौम के पर तीनों मित्र थे । अंतरंग । हिन्दू एक बनिये के यहां मुनीम था । मुसलमान ने एक चौराहे पर लोहे का खोखा रख छोड़ा था । फटे पुराने कपड़ों की इस्त्री से सलवटें निकालता और अपना गुजारा करता । सिख ने बस-स्टैण्ड के पास एक छपरा डाल रखा था और दो-तीन पुराने मूढे उसके स्वामित्व में थे । चाय का ढाबा था । वह घर से आते वक्त सुबह स्टोव, चाय-चीनी के डिब्बे, पुरानी मैली केतली में दूध तथा चार-पांच किनारे टूटे या डण्डी झड़े कप-प्लेट लाता । दिन-भर दुकानदार बना रहता और रात को अपनी दुकानदारी पैबंदधारी, एक कस्से वाले थैले  में समेट  ले जाता ।
तीनों अलग-अलग पेशे से सम्बन्धित थे पर तीनों आदमी थे । गूंगे थे या जान-बूझ कर बने हुए थे, कोई नहीं जानता । उन्हें कभी किसी से बोलते, किसी ने नहीं देखा । बस, मौहल्ले के लिए वे मात्र हिन्दू, मुसलमान और सिख थे । यही उनका परिचय था ।
     तीनों में गूंगेपन की समानता के साथ-साथ एक और बड़ी समानता थी । वह थी उनका निपट अकेला होना ।  न कोई आगे, न कोई पीछे । वे तीनों अपने चारों ओर स्वयं थे ।
लोगों से हाथ-जोड़ ‘रामरमी’ के अलावा न घनिष्ठता थी, तो न बैर । तीनों दुर्गा मौसी के यहां जरूर कभी-कभार चले जाते थे । क्यों जाते थे, वे स्वयं नहीं जानते । उनके लिए इतना काफी था कि मौसी उन्हें अच्छी लगती थी और अपनत्व देती थी ।
मौसी के यहां वे  कभी खाली हाथ नहीं गए क्योंकि वे मौसी की आर्थिक स्थिति से वाकिफ थे । इसीलिए मौसी के यहां जाने के दिन तीनों की स्वनियोजित जिम्मेदारी ओढी हुई थी । बनिये का मुनीम दो किलो आटे का पैकेट, तो सिख ढाबे पर बचा हुआ या फिर खरीदकर आधा किलो दूध और अखबार के कागजों में पुड़िया बांध कर थोड़ी-थोड़ी चाय-चीनी ले आता । धोबी के जिम्मे पत्तागोभी या फूल या फिर आधा किलो आलू व दो प्याज होते ।
     मौसी के घर जाते वक्त तीनों के चेहरे खुरदरे, आंखें पथरीली और पपड़ी जमे सूखे होठों पर सिकुड़न होती । वे मौसी के घर में खुल कर सांस लेते । बिलकुल आदमी की तरह । अनौपचारिक होकर रहते । बस, दुर्गा मौसी के साथ यही उनका सम्बन्ध था । मौसी सबकी मौसी थी, इसीलिए उनकी भी थी । वैसे वह उनकी कोई न थी ।
    जब वे मौसी के घर से लौटते होते तो उनके चेहरे सीलन-भरे से, आंखें भीगी-भीगी और होठों पर ललाई व फड़फड़ाहट होती ।
    मौसी का रहन-सहन और आचार-व्यवहार ही उसका परिचय था । निश्तेज आंखें, सूनी कलाईयां, बीहड़-सी विरान मांग और धोती रूपी अंगोछे पर नित्य बढते पड़-पैबंद ही मौसी की शख्सियत थी । मौहल्ले के घरों में झूठे बर्तन मांजना और दिनभर गुप्तांगों की गंदगी सहते कपड़ों की सफाई मौसी की जीवन गाथा । पर वह खुश थी । आपदाओं की कोई शिकन उनके चेहरे पर नहीं होती ।
लता दुर्गा मौसी की इकलौती संतान थी । वयस्कता की दहलीज पर पांव रखने को आतुर अल्हड़ युवती । खूबसूरती का पारावार न था । मां-बेटी आपस में बहनें-सी लगती थी । दुर्गा मौसी भी उन दिनों 35-36 वर्षो की रही होगी ।
तीनों मित्र चबूतरे पर बैठे थे ।
अपने-अपने धंधे से लौट कर घण्टे-डेढ घण्टे साथ बैठना उनकी दैनिक क्रिया थी । वे चुप थे । हमेशा की तरह मुसलमान दोस्त गंदी हथेली में खैनी घोटने में तल्लीन था । सिख सूने गगन में न जाने क्या ढूंढ रहा था । हिन्दू अपनी टाट खुजला रहा था । पलकें बार-बार झपक रही थी उसकी । वह एकाग्र न था । उद्विग्न-सा जेब से तुड़े-मुड़े नोट निकाल, गिनने लगा ।
हथेली से थपकी मार खैनी का चूना उड़ाया गया । हल्के भूरे-काले रंग का नशा हथेली में तीनों के लिए तैयार था । तीनों ने चुटकियां भर होठों के भीतर जैसे छुपा कर मूंगा मोती रखा । बाकी का कूड़ा हाथ झाड़ कर गिरा दिया ।
मुसलमान व सिख आदमी ने देखा, हिन्दू आदमी परेशान था । बार-बार नोट गिने जा रहा था । यह जानते हुए भी कि गिनने की आवृत्ति से नोट बढेंगे नहीं । दोनों कौमों की आंखें टकराई । तरल पदार्थ-सा आंखों में हिचकोले खाने लगा । पुतलियां गड्ड-मड्ड हुई । दोनों ने अपनी-अपनी जेबों में हाथ डाले। जितने भी रुपये थे, निकाले । गिने, पूरे दो सौ थे । हिन्दू की हथेली पर रख दिए ।
उसने अंतिम बार टाट खुजाई । आंखें एकाग्र हुई । फिर वह गहरा निश्वास छोड़ वह ‘फिस्स’ से हंस दिया ।
अब तीनों नि्श्चिंत थे ।
पास ही गोली चलने की आवाज सुन तीनों हड़बड़ा गये । एक-दूसरे को देखा । तीनों सलामत थे । वे अब भी आदमी थे । चबूतरे से नीचे उतरे । एक साथ झुके और चुटकी-चुटकी भर रेत उठा सर के लगा कर चबूतरे के पक्के फर्श पर डाली । ‘ढिगली’ बन गई । हल्के भूरे रंग की । सभी की रेत समान रंग की थी ।
एक दूसरे को फिर देखा । सिख मित्र ने अनायास ब्लेड निकाल ली और अपनी चमड़ी कुरेदी । खून निकल आया । दोनों ने भी सिख आदमी का अनुसरण किया । तीनों का खून लाल था । रत्ती-भर भी फर्क नहीं ।
फिर वे वहां एक पल भी न रुके । गोली की आवाज की दिशा में दौड़े । दो गली दौड़ने के बाद थम गये । देखा, दुर्गा मौसी के घर के आगे भीड़ थी । तीनों की रोमावली खड़ी हो गई । आतंकित-से इधर-उधर देखने लगे । भीड़ की फुसफुसाहट समेटने लगे और इस फुसफुसाहट में वाकया और इसका कारण टटोलने लगे ।
पास ही खड़े लिजलिजी आंखों वाले आदमी ने रहस्योद्घाटन किया । दुर्गा मौसी की छोरी लता को जबरदस्ती जीप में डाल ले गये मरदुए । कौन बरजे ? नेता का बेटा भी तो साथ था । एक -आध ने विरोध किया तो गोली चला दी । मौत के मुंह में अंगुली कौन देता ? ले गये बेचारी को । जीवन तबाह कर देंगे गाय का । नालायक स्साले.... । गहरा सांस ले वह एक तरफ हट गया ।
तीनों ने देखा, वह आदमी था । हिन्दू, मुसलमान या सिख तो न था.....! फिर ? गरीब कौम का रहा होगा कोई ।
तीनों बौखलाये-से सिहरे । मन में भय समा गया । वे जानते थे कि विरोध का परिणाम घातक हो सकता था । जिन्दा बस्ती में बुलडोजर फिरवाया जा सकता था । या फिर रात के अंधेरे में उसे जला कर श्मसान की भस्मी बनाया जा सकता था । आंखें टकराई और फिर वे अलग-अलग दि्शाओं में दौड़ गये ।
देर रात गए आदमियों ने देखा, तीन नकाबपोश आदमी अंधाधुंध गोलियां बरसा रहे थे । एक-दूसरे पर । गोली किसी के नहीं लगी ।
अगली सुबह तीनों को गिरफ्तार कर लिया गया । उन्होंने कोई प्रतिरोध न किया । यदि करते भी तो भी कुछ असर होने वाला नहीं था ।
लता का कोई पता न लगा क्योंकि पता लगाया ही नहीं गया । मौसी की ओर से औपचारिक रिपोर्ट दर्ज कर ली गई । मौहल्ले के मौजीज आदमियों के बयान लिये गये, किसी को कुछ भी पता नहीं था । गरीब कौम वाले उस आदमी को भी नहीं ।
तीनों को हवालात में डाल दिया गया पर वे खुश थे, क्योंकि सुरक्षित थे । उनके पास कुछ भी बरामद न हुआ । उन्होंने गोलियां क्यों चलाई, किसी ने नहीं पूछा । शायद जरूरत न  रही होगी ।
वे दिन-भर गहरी नींद सोते रहे । निर्द्वन्द्व, निर्विकार और निश्चिंत होकर । तीनों में से किसी को भी इससे मतलब न था कि उनके साथ क्या सुलूक किया जावेगा ? वे वर्तमान में जी रहे थे, जो बेहद जर्जर और आतंकित करने वाला था । शाम को उनसे कड़ाई से पूछताछ की गई पर वे पत्थर थे । अंततः उपलब्ध दो सौ सत्तर रुपये हड़प कर देर रात गये तीनों कथित उपद्रवियों को छोड़ दिया गया । बगैर किसी चेतावनी या जमानत के । वे हिरासत से मुक्ति नहीं चाहते थे पर सरकारी कायदे का पालन तो करना ही था ।
बाहर उनके लिए कोई ठौर न थी । तीनों चबूतरे पर आकर अनमने-से लेट गये । रात को सब सो रहे थे । कल की घटना से बेखबर होकर पर वे तीनों जग रहे थे । उनकी नजरें सामने की दूधिया रोशनी से नहाई बिल्डिंग पर टिकी थी । वहां नारी आश्रम चलता था । यानि गरीब बेसहारा अबलाओं का सहारा था वह ।
उनकी नजरों के सामने आश्रम का ‘बैक डोर’ था । जिसे सिर्फ संकटकालीन परिस्थितियों में उपयोग में लिया जाना होता था ।
रात के तीसरे पहर उन्होंने आश्रम के पिछवाड़े के गेट पर एक कार रुकती देखी । एक स्वस्थ आदमी कार से उतरा । इधर-उधर देख कर तीन बार फाटक पर ठक-ठक की । गेट खुला और प्रबन्धिका ने आगन्तुक को देख, मुस्करा कर हाथ जोड़ दिए लगते थे । वे दोनों अन्दर चले गये ।
तीनों ने अचकचाकर एक-दूसरे को देखा । आंखों की पुतलियां फुदकने लगी । आपस में एक-दूसरे का हाथ दबाया और पुनः उसी ओर देखने लगे ।
वह आदमी एक लड़की को जबरदस्ती बाहों में उठाये ला रहा था । वह मचल रही थी, पर नारी थी । वे तीनों उकड़ू होकर बैठ गये । फिर वापस आंखें वहीं चिपका दी ।
आदमी ने लड़की को कार की पिछली सीट पर डाल दिया और स्वयं भी बैठ गया । प्रबन्धिका ने हंसते हुए हाथ हिला कर आदमी को विदा किया और गेट बंद कर लिया । कार स्टार्ट हुई और पलक झपकते आगे बढ गई ।
तीनों ने एक साथ लड़की में लता को देखा । उन्हें आदमी पर घिन्न हो आई । भीतर का आदमी जागा । तीनों की तनी हुई भींची मुट्ठियां एक साथ चबूतरे के फर्ष पर पड़ी, पर वे स्थितप्रज्ञ थीं ।
‘आक....थू....!’ उन्होंने एक साथ बलगम बाहर उछाला ।
तीनों में मूक वार्ता हुई । लड़की को आश्रम से भगा ले जाने का आरोप कहीं उनके माथे न मढ दिया जावे, इसी चिंता से ग्रस्त थे ।
फिर दुर्गा मौसी के यहां जाने का विचार किया पर मन नहीं माना । खुरदरे चेहरों से एक-दूसरे को टटोला । वे आदमी थे ।
अगले दिन सिख ने दाढी मुंडवाई । हिन्दू ने नकली दाढी-मूंछे और भगवा वस्त्र पहने । मुसलमान ने इधर-उधर से कुछ मैले-कुचैले छोटे-छोटे चिकने पत्थर इकट्ठे कर संदूकची में भरे और फकीर बन गया ।
तीनों ने वेश बदलकर एक-दूसरे को देखा और चौंक गये । वे तीनों ही खुद नहीं थे । आश्वस्त होकर बस्ती की अलग-अलग गलियों में फिसल गये ।
दिन-भर इधर-उधर घूम-फिर कर रात को अंधेरे सूखे कुए की तलहटी पर तीनों मिले । एक-दूसरे को गहरी आंखों से देखा । गहरा निश्वास छोड़ जैसे एक-दूसरे को एकत्रित सूचनाओं से अवगत करवाया हो ।
तीनों दुखी थे । मौसी की हालत रुला-रुला जाती थी पर कोई उपाय न था । वे रोते-सुबकते, भूखे-प्यासे वहीं पड़े सो गये ।
दुर्गा मौसी ने अफसरों की खूब मिन्नतें की । लता नहीं मिलनी थी, सो नहीं मिली । लड़की को ढूंढने के आश्वासन बदले, जो आया, वही मौसी को बरत गया । बिस्तर पर सो-सो कर दुर्गा खुद बिस्तर बन गई पर लता की कोई खोज-खबर न मिली । गरीब कौम वाले आदमी के अनुसार छोरी वहां के नेता की गिरफ्त में थी । सब जानते थे, पर वे अनजान थे । वह आदमी भी यह जानकारी सरकार की पीठ पीछे रखता था । आगे नहीं रखना चाहता क्योंकि उसके घर में भी जवान छोरी थी ।
रात के गहराते सन्नाटे में गोलियां चलने की आवाज सुन उनकी नींद उचट गई । कान खड़े हो गये । अंधेरा आंखों में पसरने लगा । डर के मारे उनका बुरा हाल था । असुरक्षित होने की बात तीनों जानते थे, इसीलिए भयभीत थे ।
पास ही के पेड़ पर बैठा उल्लू बोला । तीनों ‘खम्म’ खाकर उठ खड़े हुए । आंखों में अजीब-सी चमक थी । एक-दूसरे को देखा और फिर दौड़ते हुए अंधेरे में खो गये ।
दंगाइयों से छीने हुए रिवाल्वर ही उनकी सुरक्षा के आधार बने । बस्ती रात-भर गोलियों की आवाज से गूंजती रही । कई कमजोर दिल वालों की ष्वास-नलिकाएं अवरुद्ध हो गई पर बारूद बरसता रहा । अविरल, अनवरत ।
मामला संगीन था । स्थानीय नेता व उसके पुत्र की हत्या हो गई थी ।
अगली सुबह अखबारों में छपी साम्प्रदायिक दंगे की सुर्खियां बस्ती की चर्चा का विषय थी । पुलिस ने तीन खूंख्वार दंगाइयों को गिरफ्तार कर लिया था और अभी धर-पकड़ जारी थी । उपद्रवियों की गिरफ्तारी बस्ती के लिए सुकून थी । गरीब कौम वाले आदमी के अनुसार उन तीनों की कभी-भी हत्या हो सकती थी, क्योंकि मारे गये नेता की कई सुदृढ शाखाएं थीं ।
कुछ दिनों बाद सब कुछ सामान्य हो गया । दंगा इतिहास बन गया पर वे तीनों कथित दंगाई न्यायिक हिरासत में थे । तीनों निश्चिंत थे, क्योंकि वे सुरक्षित थे । सरकारी रोटी वक्त पर मिल रही थी । पीछे कोई रोने वाला था भी नहीं ।
लता अपने घर पहुंच गई थी । नेताजी की मृत्यु के अगले ही दिन ।
कई साल उन तीनों को सरकारी मेहमान बन कर रहना पड़ा । गिनती उनके लिए कोई मायने न रखती थी । फिर उनके द्वारा चलाई गई गोलियों को स्वयं की सुरक्षा के लिए उपाय मान तीनों को छोड़ दिया गया । बाहर के हालात सामान्य थे । इसलिए वे बाहर आकर भी खुष थे । वे तीनों चुपचाप चबूतरे पर आ बैठे । मुस्करा कर एक-दूसरे को देखा और फिर ‘हुंह’ की मुद्रा में गर्दन हिला तीनों ने गहरा सांस लिया ।
चबूतरे से नीचे उतर कर चुटकी-चुटकी भर रेत उठाई और फर्ष पर डाली ।  वह अब भी हल्के भूरे रंग की थी ।
तीनों एक दूसरे के गले मिलने लगे ।
सम्पर्क से पता चला कि लता अब ब्याहता थी और मौसी ने ‘भगवा’ ले लिए । कुछ लोगों ने मौसी के गांव परित्याग को हत्या की आशंका से प्रभावित पलायन बताया, तो कुछ ने दबी जुबान में हत्या का संदेह भी जाहिर किया । अलबत्ता यह कोई नहीं जानता, मौसी कहां है ? तीनों ने निराश मन से गांव छोड़ने का निर्णय लिया ।



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3 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर रचना,
    बधाई.
    मदन गोपाल लढ़ा
    महाजन

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  2. साम्प्रदायिक सद्भाव का अनोखा समन्वय एवं मानवता की सच्ची सेवा का उदाहरण । आप बधाई के पात्र ।
    डा राधाकिशन सोनी

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जगजाहिर