गुरुवार, 5 नवंबर 2009


टूटते सितारे

मौत के समाचार ने मुझे बहुत दुःखी किया । अन्यथा वह था तो पराया आदमी ही । सम्भव है, स्वार्थ की अर्द्ध पूर्ति इसका कारण रहा हो । खैर ! जो कुछ भी रहा हो, वह था वाकई एक प्रेरक और लाजवाब व्यक्तित्व । हमारी अन्तरंगता का सूक्ष्म संसार मेरी दैनन्दिनी का वर्तमान है, त
मैं मांगी से बहुत प्रभावित था, सभी जानते हैं । शायद इसीलिए उसकी
मांगी का इतिहास । मैं अनमना-सा तुड़ें-मुड़े पन्नों में सिमटे नैतिक मूल्यों के इस स्तुत्य एवं कालजयी इतिहास का पुनरावलोकन करने लगा ।
इस कारण ही लोग उसे बनिया कहने लगे थे परन्तु जाति से वह बनिया नहीं था । दैनिक आवश्यकताओं की प्रायः सभी वस्तुओं यथा आटा, दाल, घी, तेल से लेकर लट्ठा-पट्टा और शराब तक मिलती थी वहां । अंग्रेजी और देशी दोनों । शराब ठण्डी रखने के लिए वहां देशी फ्रीज यानि जोधपुरी मटकों का जुगाड़ बिठा रखा था । जिनमें वह पानी ठण्डा रखता और उसमें शराब की बोतलें । मैं मांगी के पास वाली गली में मुड़ने ही वाला था कि उसने पीछे से आवाज दे डाली -‘ अरे मास्टरजी ! ऐसी भी क्या नाराजगी है ? क्या खता हो
चाहे शराब का ठेका कह लो, चाहे विभागीय भण्डार, गांव की एक मात्र दुकान थी वह.... मांगी बनिये की दुकान । मांगी सूद का धंधा भी करता था
, गई हमसे ? जरा इधर आ के देखो तो सही.... बिलकुल प्योर और टनाटन माल है ...... कल ही तो निकाल कर लाया हूं..... देखते ही नशा चढने लगता है । जरा चख कर तो देखो, जिन्दगी-भर भुला न पायेंगे मांगी को, हां !’ पीछे से आती आवाज सुन मेरे पांव जैसे जम कर रह गए । थके कदमों से मैं दुकान की तरफ चल दिया ।
िन को आराम मिलता, न रात को चैन की नींद नसीब होती । इतना परिश्रम करने पर भी पार नहीं पड़ती । सामाजिक इज्जत की तो बात ही बेमानी है । इज्जत भी बेचारी क्या करे ? हर घर में मास्टर पैदा होने लगे हैं । हर नुक्कड़ पर दो-तीन मास्टर बैठे मिलते हैं । दिन-रात की मगज-पच्ची और आमदनी...? हर माह की बीस तारीख के बाद पाॅकेट निर्जला एकादशी ही रखती है । बेचारी पाॅकेट....! यही सब सोचते-विचारते मैं मांगी की दुकान पर पहुंचा । .1. ‘मांगी...... यार, इस महीने तुम्हारा हिसाब जरूर कर दूंगा.....’ मैंने उसके कुछ कहने से पूर्व ही उसे आश्वस्त करना चाहा । ‘अरे वाह मास्टरजी ! क्या आप मांगी को इतना घटिया इंसान समझते हैं ? आपके पैसे कहां जाते हैं...? मां भवानी की कसम, मैंने आपको उधारी का तकाजा नहीं किया था.....मास्टरजी,
हालांकि मैं मांगी की आंखों से बच कर निकलना चाहता था परन्तु किस्मत ने साथ नहीं दिया । मुझे यह भय खाये जा रहा था कि मांगी उधारी का तकाजा करेगा, तब क्या जवाब दूंगा ? मैं स्वयं पर ही झुंझलाने लगा...हुंह.., मैंने भी कहां जान-बूझ कर मुसीबत गले लगा ली...? मास्टरी भी स्साली कोई नौकरी है ....? न
दि आप नहीं जानते, मांगी का दिल कितना बड़ा है....? मैं तो कह रहा था कि ‘ए वन’ चीज है, मौसम भी रंगत जमा रहा है, यदि इच्छा हो तो....?’ मांगी दुकान पर बिखरे सामान को व्यवस्थित करता हुआ बोला । ‘इच्छा क्या होगी मांगी....?’ मैंने भी टालने के उद्देश्य से कहा -‘शराब और शवाब की लत कितनी बुंरी होती है, सभी जानते हैं । क्या तुमने नहीं संुना कि पहले तो आदमी शराब को पीता है और बाद में शराब आदमी का रक्त पीती-पीती पूरे को ही पी जाती है ।’ ‘देखो मास्टरजी ! ये सब बेकार की बाते हैं । इनमें कोई दम-खम या तंत वाली बात नहीं है । अरे... क्या आपने हमारे प्राचीन ग्रंथों में सौम रस की महत्ता नहंीं पढी ? यदि शराब कोई बुरी चीज होती तो हमारे देवता क्यों इस चीज का सेवन करते ..? भगवान शंकर तो जब तक भांग-गांजे की सुट नहीं लगा लेते थे, तब तक तो उनकी आंखें भी नहीं खुलती थी और ना ही इसके बिना भोजन पचता था.......!’ मांगी ने हाई-काॅर्ट में मुकदमें की बहस करते वकील की तरह दलील पेश की ।
ा मुझे...।’ आंखों से टपक गालों पर पसरे आंसुओं के कतरों को हथेली से पौंछते हुए मांगी ने रुंआसे स्वर में कहा । मांगी की ये बातें सुन कर मैं उसके भीतर छुपे उज्ज्वल इंसान के दर्शन करने की कोशिश
‘हां मांगी, सौम-रस की महत्ता को तो पढा है मगर यह भी मत भूलो कि वे देवता थे और हम....? हम ठहरे निरे सांसारिक और गृहस्थी वाले । हम उनकी क्या हौड़ करेंगे ? कहां तो राजा भोज और कहां गंगू तेली ?’ मेरा तर्क सुन कर मांगी निराश और निरुत्तर हो गया । बोला-‘ आप ठीक कहते हैं मास्टरजी । मैं भी बाल-बच्चेदार आदमी हूं । मुझे ही ले लिजिए, खुद शराब बेचता हूं परन्तु पीता हरगिज नहीं । यह स्साला शराब का धंधा भी कोई धंधा है...? लोगों को गलत रास्ते पर डालो.....उन्हें जहर पिलाओ और अपना पेट भरो । न जाने कितनी बहु-बेटियों और मांओं की आत्माएं मुझे गालियां और बद्दुआएं दे रही है...? पर क्या करू... यह जो पेट है न...!’ उसने अंगुली से अपने पेट की तरफ इसारा करते हुए कहा -‘इस एक के साथ घर के आठ लोगों की भूख जुड़ी है । इसके गड्ढे को भरने के लिए न जाने क्या-क्या करना पड़ता है ? अभी तो सभी मेरे बने हुए हैं मगर जब मरूंगा तो कोई साथ नहीं जाएगा । उस वक्त वह ऊपर वाला नरक में भी ठौड़ नहीं दे
गा करने लगा । मैं सोच रहा था कि परिस्थितियां और मजबूरियां इन्सान को किस कद्र बेरहम होकर .2. बुराई की गर्त में धकेल देती है । कैसे एक सीधे-सादे-सच्चे इंसान को नकाब ओढने को बाध्य कर देती है ? भूख के थपेड़े आदमी की भावनाओं और इच्छाओ-आकांक्षाओं को किस तरह दमित और विगलित कर देते हैं ? मांगी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में और अधिक जानने की इच्छा को मैं दबा नहीं पाया । मैंने उसके पास बैठते हुए कहा -‘ और तो क्यां मांगी, लाओ बीड़ी ही पिलाओ ।’ ‘हां..हां.. जरूर ।’ उसने अपनी जेब में हाथ डाल कर बण्डल-पेटी निकाले और मेरी तरफ करते हुए बोला -‘लो मास्टरजी ! मैं तो नहीं पीता पर ग्राहकों के लिए रखनी पड़ती है ।’ मुझे आश्चर्य हुआ कि मांगी बीड़ी तक नहीं पीता । पूछने पर उसने हिसाब समझा दिया -‘ आदमी औसतन एक बण्डल रोज तो पी ही जाता है और साथ ही माचिस अलग से चाहिए । पांच रुपये रोज का खर्चा तो मान ही लें...?’ मैंने सिर हिलाते हुए हां में हां मिलाई, वह आगे बताने लगा ।
ीते दिनों की स्मृतियों की घाटियों में उतर गया । उसकी सांस फूलने लगी । मेरे भीतर की उत्सुकता जबरन टपक पड़ी । ‘फिर...?’ ‘फिर... फिर क्या करता मास्टरजी ? अभाव मे ंभूख भी तो अधिक लगती है ना ! कुछ दिन तो जमींदारों की जी-हजूरी की । हाथ से भर-भर कर दारू पिलाई । यहां तक तो सहन भी कर लेता पर पीने के बाद स्साले मां-बहिन की कहने से भी नहीं चूकते थे । उकताया हुआ तो था ही, लोगों की देखा-देखी मैंने भी रांगज
-‘साल में तीन सौ पैंसठ दिन होते हैं, इस तरह साल में एक हजार आठ सौ पच्चीस रुपये तो फालतू ही गये मानो ? उलटे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है ही । जाने-अनजाने कपड़े जलाने में बीड़ी सबसे आगे..... अब तक चालीस की उम्र हुई है । अगर बीस साल ही बीड़ी के नशे से स्वयं को उबरा मानूं तो बीस गुणा अठारह सौ पच्चीस यानि छत्तीस हजार पांच सौ रुपये की बचत तो मैंने की ही है ...! और वह आपका लीप-ईयर जो होता है, वह अलग ।’ मैं मांगी की इस कैलकुलेशन और समझ पर स्तब्ध रह गया । उसका यह उजला पक्ष तो वाकई स्तुत्य था । मैंने कौतुहल-वश पूछा -‘ तो फिर यह शराब का धंधा कैसे शुरू कर दिया...? खुद प्रकाश में रह कर लोगों को अंधकार में डुबोने का कारण...?’ ‘क्या बताऊं मास्टरजी...? मैं भी खेती-बाड़ी ही करता था । मुझे यह पीना-पिलाना जरा भी नहीं सुहाता था । शायद ऊपर वाले को मेरा यह अभिमान अच्छा नहीं लगा । अकाल पड़ गया और फिर तो अकाल पर अकाल, साल-दर-साल, लगातार चार साल....!’ इतना कह मांगी
बीड़ और पुराने गुड़ की दारू निकालनी शुरू कर इदी । धंधा चल निकला । खेत जो था, उधार के बदले जमींदार डकार गया । एक बार थानेदार ने अंदर भी कर दिया था । बोला- यह दारू क्यों निकालते हो ? मैंने कहा पेट के खातिर । इस पर बिगड़ .3. गया । बोला - पांच सौ रुपये निकाल वर्ना चक्की पीसेगा जेल में । मैंने कहा - रोटी तो मिलेगी जेल में, यह क्या कम है ? उसने मुकदमा बना दिया, मैं कचहरी जा-जूकर बरी हो गया । खाली पच्चीस रुपये में ।’ मांगी ने वर्षो से छुपाया राज निस्सकांच मुझसे साझा कर लिया । ‘वैसे मास्टरजी, मैं अब दारू बंद कर रहा हूं । भगवान का दिया सब कुछ है । अब तो यह खोटा धंधा छोड़ूंगा ही....।’ मैं बीड़ी पी चुका था । उठने को ही था कि मंगतू आता दिखाई दिया । मांगी का चेहरा खिल उठा । ‘मांगी तू तो आजकल कोरा पानी देता है । अरे ! दो रुपये कड़े ले ले, चीज तो ऐसी दे कि हलक में उतरे तो पता लगे....।’ मंगतू ने उलाहना दिया । भीमा ठेकेदार भी आ पहुंचा । उसने भी टेर मिलाई -‘हां यार ! आजकल यह मिलावटी रखने लग गया है....!’ ‘ अरे यारों, यह लो खालिस केसर-कस्तूरी । तुम भी क्या याद रखोगे ?’ मांगी ने मटके से बोतल निकाल आगे परोसी । पीछे से आती आवाजें धीमी पड़ने लगी थी । आसमान में टूटता तारा अपनी लकीर समेट रहा था ।

उस दिन के बाद हमारा यह अपनत्व बढता ही गया । मैंने जाना कि मांगी वास्तव में जैसा दिखता है, वैसा नहीं है । मुझे संदेह हुआ, कहीं वह सचमुच तो पानी मिला कर नहीं बेचता । पुरोधा जो ठहरा...। कल रात को मांगी की तबियत अचानक बिगड़ गई । अपने लड़के से कहने लगा -‘ चाहे भीख मांग कर खा लेना पर दारू का यह खोटा धंधा मत करना ।’ मांगी को जाना था, चला गया । बाहर कोतवाल अंत्येष्टि मे चलने की आवाज दे रहा था । मैं उठ खड़ा हुआ । मैंने मन ही मन कहा-‘तुम्हें इतनी जल्दी नहीं करनी चाहिए थी मांगी ।’ दैनन्दिनी के पन्ने फड़फड़ाये । मुझे लगा जैसे मांगी दैनन्दिनी के रूप में मेरे सामने है । मैंने इस टूटते सितारे की लकीर को थामा और सहेज कर आलमारी में रख दिया ं।

रवि पुरोहित
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5 टिप्‍पणियां:

  1. चिट्ठा जगत में आपका हार्दिक स्वागत है. लेखन के द्वारा बहुत कुछ सार्थक करें, मेरी शुभकामनाएं.
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    महिलाओं के प्रति हो रही घरेलू हिंसा के खिलाफ [उल्टा तीर] आइये, इस कुरुती का समाधान निकालें!

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  2. बहुत ही अच्‍छा एवं सराहनीय
    हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और शुभकामनायें
    कृपया अन्य ब्लॉगों पर भी जाकर अपने अमूल्य
    विचार व्यक्त करें

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  3. सच कहा है
    बहुत ... बहुत .. बहुत अच्छा लिखा है
    हिन्दी चिठ्ठा विश्व में स्वागत है
    टेम्पलेट अच्छा चुना है. थोडा टूल्स लगाकर सजा ले .
    कृपया वर्ड वेरिफ़िकेशन हटा दें .
    कृपया मेरे भी ब्लागस देखे और टिप्पणी दे
    http://manoj-soni.blogspot.com/

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जगजाहिर