शनिवार, 21 नवंबर 2009

सहारा








सहारा



बिलकुल झौंपड़ीनुमा मकान । ठीक मध्य में खूंटी के सहारे लटकती हुई एक लालटेन, जो केरोसिन की अपर्याप्तता के बावजूद अपनी लौ को प्रज्ज्वलित रखने के लिए अंधेरे से जूझ रही थी ।
खट....खट....खट....खट.... की अबाध गूंजती ध्वनि वातावरण में पसरे सन्नाटे को चीरती चली गई । बाहर से आती चैकीदार की ‘पहरेदार.....खबरदार....!’ की आवाज इस खटखटाहट के तले कहीं दब कर रह गई । दरवाजा लगातार खटखटाया जा रहा था । जान पड़ता था मानो कुछ देर और नहीं खोला गया तो दरवाजे की शामत आ जायेगी ।
भीतर से आती किसी बेसहारा अबला की हृदय विदारक सिसकी धीरे-से कर्णो से टकराकर उनको सचेत करती हुई कहीं अंधेरे में लोप हो गई । गोद में लेटे बच्चे को एक तरफ खड़ा करके अभी वह पूरी तरह अपनी गर्दन भी सीधी न कर पाई होगी कि सहसा बारूद का गोला-सा फूटा । दरवाजा चरर....चर्र..... की आवाज के साथ गिर कर धरती के गले जा मिला ।
मकान में एक साया-सा लहराया, जिसे देख कर बच्चे की किलकारीनुमा चीख फिर से खामोशी को भंग कर गई ।
‘मां .... छिप जा...... मां.... बापू.... !’ बच्चा रोते-सुबकते गुलाबी के पांवों से बुरी तरह लिपट गया ।
ने लगा ।
‘मां... छिप जा... मां... बापू....!’ बच्चे ने पहले से भी अधिक मजबूती से मां के पांवों को थाम लिया । वह गुलाबी को भयातुर नजरों से देख रहा था ।
शराबी लड़खड़ाते कदमों से आगे बढ रहा था कि सहसा लटकती लालट
‘ऐ ... स्साला, मेरा खून.... मेरी औलाद.... और हिमायत करता है अपनी मां की.... हरामी की टांगें तोड़ दूंगा ।’ इतना कह कर साये ने जेब में रखा देशी ठर्रे का अद्धा निकाल मुंह के लगा लिया और गुलाबी की तरफ ब
ढन उसके सिर से टकरा गई । ‘ ऐ... उल्लू की पट्ठी.... तू भी नखरे करती है...? ले पहले तेरा ही कल्याण करता हूं ।’ जैसे ही उसने लालटेन को खींचा, उसका ढक्कन खुल गया । जितना भी केरोसिन था, सिर के बाल भिगोता चला गया और दूसरी तरफ पास में पड़े केरोसिन के पीपे से शराबी के लड़खड़ाते कदम टकराये । सारा तेल फर्श पर फैल गया, जिसके कारण आग के शोलों ने शराबी को अपनी चपेट में ले लिया । दृष्टि-पटल पर अगर कुछ था तो सिर्फ और सिर्फ आग की लपटें । शराबी पूर्णतः आग की लपेट में आ चुका था । आग की तपिश से नशा हवा हो गया और वह लगातार मदद के लिए चिल्लाये जा रहा था ।
गुलाबी का शराबी पति भगवान को प्यारा हो गया । गुलाबी और उसके बच्चे का रोते-रोते बुरा हाल हो गया । उनका चेहरा किसी मुरझाये फूल और शरीर पेड़ की टूटी टहनी के समान जान पड़ता था ।
गुलाबी के पति की चिता की सभी रस्में पूरी हो चुकी थी । चिता को आग दी जानी थी । वह लगातार भगवान को कोसे जा रही थी ।
ा । पार्थिव देह राख की ढेरी में बदल गई । गुलाबी के बेटे वीरू की हृदय विदारक चीखें रुकने का नाम नहीं ले रही थी ।
चिता में आग लगा दी गई । आग के शोले हवा से बातें करने लगे । गुलाबी की आंखों में मकान में लगी आग का दृश्य आकार लेने ल
गा
ेख, वह मौहल्ले के घरों में बर्तन मांजने, कपड़े धोने और झाड़ू-पौंचे का काम करने लगी । वैधव्य और परिस्थितियों का काल-ग्रास बने उसके रूप-सौंदर्य पर धीरे-धीरे पीलापन नजर आने लगा । उसके भीतर दुःखों का ज्वार उमड़ रहा था पर किसे मतलब है पर-पीड़ा को समझने और बांटने से ? हर कोई अपना उल्लू सीधा क
पगलाया-सा राख की ढेरी के सामने खड़ा वह लगातार बड़बड़ाए जा रहा था -‘बापू.... बापू ! तुम कहां हो बापू.... ? तुम वापस आ जाओ बापू.... अब मैं मां का बेटा नहीं बनूंगा.... तुम कब आओगे बापू...?’ रोते-रोते वीरू की हिचकियां बंध गई । उस समय बाप-बेटे के प्यार के बीच शराब का कोई गतिरोध नहीं था ।
गुलाबी के जीवन का सहारा टूट चुका था । वैधव्य के चलते उसका कलेजा मुंह को आ राह था । घर काट खाने को दौड़ता । खुद की और बच्चे की भूख भयावह रूप लेती जा रही थी । पेट के गड्ढे को भरने के लिए उसे कुछ-ना-कुछ तो करना ही होगा । और कोई रास्ता न
देरने में लगा है । वह जिस किसी की तरफ भी सहानुभूति हेतु याचक निगाहों से ताकती, सबकी आंखों में वासना और तिरस्कार के भाव देख कर उसका सर्वांग कांप उठता ।
शाम का धुंधलका होने ही वाला था । गुलाबी मौहल्ले के घरों में काम करके अभी घर लौटी ही थी कि सहसा ठेकेदार के बेटे राजू ने उसे आ दबोचा । वह बहुत चीखी-चिल्लाई पर उसका सारा विरोध-प्रतिरोध राजू की बलिष्ठ बाहांे में कैद हो बेअसर हो गया । उसका रोना हवा में बह गया । कोई भी उसकी सहायता को नहीं आया । जान पड़ता था मानो पूरा मौहल्ला श्मसान के सूनेपन में तब्दील हो गया हो । गुलाबी के हृदय में सैंकड़ों चिताओं की लपटें लपलपाती जल उठी ।
दुष्ट राजू ने गुलाबी के स्वाभिमान को तार-तार कर दिया । जिस इज्जत और सतीत्व के लिए वह सब तरह के अभावों से जूझ रही थी, उन्हीं का रेशा-रेशा उधड़ कर पौर-पौर पीड़ पसराने लगा । वह रोती-कलपती रही पर नापाक राजू तो कब का जा चुका था ।
्यास बुझाने वाला राजू आज फिर आ धमका गुलाबी के पास । परन्तु इस बार न तो गुलाबी चीखी-चिल्लाई और न ही कोई प्रतिरोधी हरकत ही की । उसने चुपचाप स्वयं को राजू के हवाले कर दिया । गुलाबी में यह परिवर्तन देख कर एक-बारगी तो राजू भी आश्चर्य में पड़ गया ।
धीरे-धीरे यह गुलाबी का पेशा बन गया...रुजगार और पेट के गड्ढे को भरने का आधार बन गया । राजू अब अक्सर गुलाबी के पास आने लगा ।

धरती पर आहिस्ता-आहिस्ता पसरकती चन्द्रमा की चांदनी वातावरण की प्राकृतिक छटा को निखारने में लीन थी । सरसती
मुसीबतें आती है तो चारों तरफ से आती है । गुलाबी पर परेशानियों का एक और पहाड़ टूट पड़ा । उसके एक हाथ को लकवा मार गया । उसके सब काम-धंधे छूट गये । गरीबी में आटा गीला । वह दाने-दाने का मोहताज हो गई । दर-दर की ठोकरें और सांसारिक जिल्लत उसका जैसा नसीब बनने लगा । डूबती नाव पर कौन सवार हो, रिश्तेदार ही किनारा कर लेते हैं तब पड़ौसियों से कोई क्या उम्मीद करे ? वे सब तो महज तमाशबीन थे । वैसे भी बिना स्वार्थ के कौन किसकी मदद करता है । किसी ने सहानुभूति जतलाना भी जरूरी नहीं समझा । पति की मौत का दुःख अब भी पत्थर बना उसके कलेजे से चिपका हुआ था । विगत की स्मृतियों के थपेड़ों से उसकी सिसकियां रह-रह कर हवा में तैर जाती । अंधेरा अभी पूरा पसरा नहीं था, या यूं कहें कि गोधूलि बेला थी । किसी की आहट पाकर गुलाबी स्मृतियों की सुसुप्तावस्था से जाग उठी । कौन ? राजू.... ! हां, राजू ही तो था । अबलाओं की इज्जत से
प्या ठण्डी हवा के थपेड़े गुलाबी के कपोलों का स्पर्श करते हुए आगे कूदते-फांदते गुजर जाते... । आह.... कितना सुखमय स्पर्श.... पति की कोमल अंगुलियों का-सा स्पर्श । एक औरत इस स्पर्श की खातिर अपना सर्वस्व त्याग सकती है । इस एक स्पर्श के रोमांच से वह सदेह इस स्पर्शावली में ही समा जाने को उद्यत हो सकती है परन्तु मर्द ठहरा भ्रमर-गुणी । वह भला इस अंतरंग संवेदना को कब-कैसे समझे ? मैं क्या हूं...? कुछ भी तो नहीं..... मेरा कोई वजूद नहीं .....मैं महज एक खिलौना हूं....नहीं, नहीं... मैं कुछ हूं.... लेकिन क्या... हां.... मैं एक नारी हूं....इस जगत की जननी....सामाजिक पापों की संहारक...! आज गुलाबी स्वयं को भी पहचान नहीं पा रही थी । नारी का वजूद एक यक्ष पहेली के रूप में उसके समक्ष मौजूद था । इसकी कोई निष्चित परिभाषा नहीं । वह अपने-आप में उलझी हुई है । स्वाभिमान तो कब का धराषायी हो चुका । हां... औरत मिट्टी का घरौंदा ही तो है.... जिसे जब चाहे मनुज आकार दे देता है और जब चाहे इसके स्वरूप को पुनः मिट्टी में मिला देता है ।
का चैगा पहन कर ऐष-ओ-आराम करते हैं । जिन बिल्डिंगां की षोभा ये पुष्पलताएं बढा रही है, उससे भी अधिक उनकी चमक न जाने मेरे जैसी कितनी अबलाओं की इज्जत की होली के धब्बे और उनके जिस्म के रक्त-सने फर्ष से निखर रही है । फिर मैं व्यर्थ ही क्यों परेषान हूं ? मजबूरियों और परिस्थितियों से मुकाबले के लिए तो औरत को रूप-सौंदर्य का अचूक हथियार मिला है । यही तो उसके अस्त्र-षस्त्र ।
पाष्र्व विचार तो आत्महत्या का भी आया मगर वीरू का चेह
गुलाबी मनोद्वेगों में उलझती चली गई । अरे भगवान ! यह तूने कैसी गलती कर दी ? क्या प्रायष्चित करेगा इसका ? हां....! तूने एक अच्छा कार्य जरूर किया जिसके चलते तुम्हारा वजूद अभी लोगों के दिमाग में कायम है । वरना पता नहीं, ईष्वर नाम का कोई अस्तित्व भी होता या नहीं ? तूने औरत को एक षक्ति बख्षी है, जिससे कोई नहीं बच सकता । आज नहीं तो कल, कल नहीं तो परसों मर्द को आखिर झुकना ही पड़ेगा । उसकी क्या बिसात जो इस वषीकरण से बच सके ? गुलाबी ज्यों-ज्यों सोचती जा रही थी, त्यों-त्यों औरत रूपी गुत्थी सुलझने की बजाय और अधिक उलझती जा रही थी । मनोद्वेगों की इस उठा-पटक से उसकी सोयी चेतना जाग उठी । अंधेरा कहीं दूर जा छिपा और चांदनी में नहा उठा गुलाबी की आंखों में समाया उसका अपना अतीत, उसका अस्तित्व । सहसा उसकी बोझिल पलकें एक विषाल बिल्डिंग पर आकर ठहर गई । बंगला.... ठेकेदार गोविंद का बंगला । रजनी की षीतलता से नहाई पुष्पलताएं.... नींव से कंगूरे तक फैली अमरबेल मानो सिल्वर-मेड हो । ये बड़े लोग इन गगनचुम्बी इमारतों में षरारफ
रा भी साथ था । फिर जान-बूझकर मौत की ओर कदम बढाना तो कायरता होगी । परिस्थितियों से घबराकर जान देना तो जीवन से हारना ही हुआ । हार मान लूं..... नहीं मैं हार नहीं मान सकती......मैं कायर नहीं हूं लेकिन अब मैं ऐसा घृणित कार्य नहीं करूंगी....दुनिया को मुझ पर थूकने का अवसर नहीं दूंगी...!’ अन्तिम षब्द गुलाबी के होठों से बाहर टपक पड़े । ‘तुम्हें अब कुछ नहीं करना पड़ेगा..!’ बोलते-बोलते ठेकेदार ने प्रवेष किया । गुलाबी आष्चर्य से ठेकेदार को ताकती रही । ‘तुम्हें सहारा मैं दूंगा और तुम्हारी जिन्दगी बनाऊंगा...... जिन जालिमों ने जुल्म किये हैं, उनसे बदला लेना है तुम्हें.....!’ ठेकेदार की नजरें गुलाबी के षरीर की गोलाइयों को मापती रही । षषि बादलों के कतरों से आंख-मिचैली करता वातावरण में पसरे अंधेरे को दूर भगाने के लिए जूझ रहा था । कभी चांद का साम्राज्य होता, कभी अंधेरे का । ठेकेदार को अपने बाहुपाष में बांध कर गुलाबी फिर से जीवन मार्ग पर चल दी । आजकल ठेकेदार अक्सर गुलाबी के घर के आस-पास नजर आता है ।



2 टिप्‍पणियां:

  1. समय-समाज के संदर्भ में लेखक की सर्जनात्मकता उजागर होती है

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  2. आपके रचनात्मक लेखन की दिशादृष्टि चिरन्तन दृष्टि ही नहीं अपितु जीवन्त ज्योति का प्रतीक है । आज हिन्दी तथा राजस्थानी को गरिमायुक्त स्थान दिलाने के लिए चहुँ ओर से सकारात्मक प्रयासों को द्रृत गति से आगे बढ़ाने की आवश्यकता है । इस दिशा में आपके प्रयास स्तुत्य हैं ।
    पुष्कल हृदयाभिनन्दन एवं सर्व विध मांगल्यकामनाएँ ।
    डा. राधाकिशन सोनी

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जगजाहिर