शुक्रवार, 4 दिसंबर 2009

जुदां-जुदां की हरकते हैं जिन्दगी, मत दिखा घाव अपने औरों को


जुदां-जुदां की हरकते हैं जिन्दगी
सिर्फ ‘स्व’ में उलझ गई है जिन्दगी । 
नखलिस्तां के कारवां भी हैं घबराते
है भयानक दानव ऐसी जिन्दगी । 
क्यों हुआ विद्रूप अब यह फिजा
कैसे समझे फुर्सत से अब जिन्दगी ।
जहां-जहां भी पड़ती है नजरें हमारी
जज्बाती नासूर है अब जिन्दगी ।
भूख से उकताये और वक्त से डरे
इंसां को अब कौन दिलाए,रेहन रखी जिन्दगी ?
***




बरसों की गिनती नहीं चाहिए जीने के लिए
बिक जाती है बीवियां, महज पीने के लिए । 
गाव-तकिये नहीं रहेगे साथ सदा
इंसानियत भी चाहिए, इंसा बनने के लिए
मत दिखा घाव अपने औरों को
ताक में है हर शख्स नमक छिड़कने के लिए
नहीं जानता कोई भी, कब व्यवस्था गाज गिरे
क्या करेगा, सोच अभी से, तब जीने के लिए ?
****

2 टिप्‍पणियां:

  1. मत दिखा घाव अपने औरों को

    ताक में है हर शख्स नमक छिड़कने के लिए

    आपकी बात हक़ीक़त बयान करती है। अच्छी रचना। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  2. blog dekhkar achchha to laga magar tippani hindi me likhni nahi aai.blog ki class ka naya vidyarthi hun,maaf karna.
    Vishwanath bhati,Taranagar

    उत्तर देंहटाएं

जगजाहिर